Thursday, 4 February 2016

कुछ दूर मेरे साथ चला जा

और कितनी ठोकरें मारोगे ऐ ज़िन्दगी
अब तो रास्तें आसान कर जा, 
कल की ठोकरें अभी भी तड़पा रही हैं 
कम से कम एक बार तो ये तड़प मिटा जा । 

मैं मिटने को हूँ बस कुछ ही देर में 
मेरे मिटने तक थोड़ा तो रुक जा, 
तू आज भी है और कल भी रहेगा 
तेरी जो ये ज़िद है, वो बस आज भुला जा ।

मैं सारे रस्ते आँधियों और तूफानों के साथ चली हूँ 
अब थोड़ी सी तो धूल हटा जा 
तू ऐसे भी क्या याद रखेगा मुझे?
अपनी ज़िद छोड़, कुछ दूर मेरे साथ चला जा ।  



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